दूकान बंद कर अपनी दूकान खुलवाई

दूकान बंद कर अपनी दूकान खुलवाई

मेरा नाम देवाकर सुभानकर है और आज आपको मैं अपनी चुदाई की मन – मोह लेने वाली कहानी सुनाने जा रहा हूँ | मैंने अपने ही दूकान वाली औरत की चुत बड़े ही मजेदार तरीके से दूकान में ही मारी और अज तक मारता हुआ आ रहा हूँ | दोस्तों दरसल मैंने अपने शहर में नया – नया घर लिया और उसके सामने ही एक दूकान भी खुलवा ली और उसे किराए पर चडा दिया जिससे मेरा आधा खर्चा भी चला जाया करता था | मेरी दूकान को एक औरत ने किराए पर लिया हुआ था और क्यूंकि दूकान मेरे घर के कतई सामने ही थी इसलिए मेरी उससे बात – चित तो हर पल हो ही जाया करती थी |

मेरी बीवी की तबियत उस समय नाज़ुक चल रही थी और सच कहूँ तो उसकी चुत में अब ताकत भी नहीं बची थी कि वो मेरे लंड को और बर्दाश्त कर सके | मैं उससे बात कर बस यूँही अपने दिल को बहला लिया करता था और कुछ ही दिनों में मेरी दूकान – वाली औरत से मत वाली बनने लगी | वो दोपहर को अब मेरे साथ ही मेरे घर पर भोजन कर लिया करती थी और उसकी चुत का भोजन करने के दिन भी बड़े करीब आ रहे थे | एक दिन जा दोपहरी को वो अपने दूकान बदन कर मेरे घर आई तो वहीँ हम आराम कर रहे थे भोजन करने के बाद और अचानक मेरे कन्धों का दर्द फिर से चालु हो गया |

उन दिनों तो मेरा नौकर भी छुट्टी पर गया हुआ था और मेरी बीवी उप्पर वाले कमरे में आराम कर रही थी | अब दूकान वाली ने मेहनत दिखाते हुए मेरे कन्धों कि मालिश करना शुर कर दिया जिससे मुझे उसके नरम हाथों से मत वाला आराम मिल रहा था | मैंने कुछ पल में ध्यान दिया कि उसके हाथ अब फिसल कर मेरे सीने तक आने लग गए थे जोकि उझे बा हलके – हलके गरमाने लगे थे | मैं धीर – धीरे मदहोश होता चला गया और मैंने उसके हाथों को थाम अचनक से खड़ा हुआ और उससे लिपट कर उसके एक – दूसरे करीब आ गया | उसके थोबड़े पर एक कामुक मुस्कान थी जोकि मूझे अब उत्तेजित सी करती चली गयी |

वो अब कुछ ही पल में अपने होठों को मेरे होंठ लहराती हुई मुझे उत्तेजित कर रही थी जिसपर मैंने उसे अपने से एक दम सिमटा लिया और उसके होठों को अपने कब्ज़े में लेता हुआ चुचों को भींचकर कर उनकी जमकर सेवा करने लगा | मैंने कुछ ही देर मैंने उसकी सदी को को उतार दिया और उसके नंगे चुचों को को मसलते हुए अपने मुंह में भरकर पीने लगा | मुझे उसके चुचों का बड़ा ही मस्त वाला स्वाद आ रहा था और मैंने अगले पल ही उसकी पैंटी को निकाल झटक दिया और उसे वहीँ अपने सोफे पर लिटाकर उसकी चुत पर अपने लंड को निकाल रगड़ने लगा और जोर का धक्का मारा जिससे मेरे लंड एक बार में ही उसकी चुत में आगे – पीछे होने लगा |

उसके बाद तो जैसे हम रुके ही नहीं और मैं दुम्दुमदुम बस उसकी चुत मारता चला गया | उसके मोटे – गोरे बदन के मैं मज़े लेता हुआ वहीँ कामुक अंदाज़ा में सारी वासना अपने लंड के तीव्र झटकों से निकल रहा था और इतने दिनों बाद मिली फुद्दी पर भी अपने लंड को ज्यादा देर ना दौड़ा पाया और आखिरकार हांफता हुआ झड गया | वो अब धीमी मुस्कान देते हुए मेरे लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी और मज़े लेता हुआ वहीँ सो गया | उन दिनों मैंने अपनी दूकान वाली की रोज दोपहर को उसकी दूकान बंद करने के बाद भोजन करते ही उसकी दूकान खोली |

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